| डा० धर्मवीर भारती |
| निदा फाज़ली |
| गोपालदास 'नीरज'
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| हास्य कवि सुरेन्द्र शर्मा। |
| अतुल कनक |
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कुमार विश्वास के गीत "सत्यम् शिवम् सुदरम्" के सांस्कृतिक-दर्शन की काव्यगत् अनिवार्यता का प्रतीपादन करते हैं। कुमार के गीतों मे भावनाओं का जैसा सहज, कुंठाहीन प्रवाह है, कल्पनाओं का जैसा अभीष्ट वैचारिक विस्तार है, तथा इस सामंजस्य के सृजन हेतु जैसा अद्भुत शिल्प व शब्दकोश है, वह उनके कवि के भविष्य के विषय में एक सुखद आश्वस्ति प्रदान करता है। |
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डा० धर्मवीर भारती
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डा० कुमार विश्वास उम्र के लिहाज से नये लेकिन काव्य-दृष्टि से खूबसूरत कवि हैं। उनके होने से मंच की रौनक बढ जाती है। वह सुन्दर अवाज़, निराले अंदाज़ और उंची परवाज़ के गीतकार, गज़लकार और मंच पर कहकहे उगाते शब्दकार हैं।कविता के साथ उनके कविता सुनाने का ढंग भी श्रोताओं को नयी दुनिया में ले जाता है। गोपाल दास 'नीरज' के बाद अगर कोई मंच की कसौटी पर खरा लगता है, तो वो नाम कुमार विश्वास के अलावा दूसरा नही हो सकता। |
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निदा फाज़ली
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डा० कुमार विश्वास हमारे समय के ऎसे सामर्थ्वान गीतकार हैं, जिन्हे भविष्य बडे गर्व और गौरव से गुनगुनाएगा। |
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गोपालदास 'नीरज' |
आखों मे गज़ब का सम्मोहन, मंच पर ज़बरदस्त पकड़, गीतों मे बाँध लेने वाली रसमयता, समय-अवसर के अनुकूल स्मरण-शक्ति और वाल्मीकि-रामायण से लेकर राधेश्याम-रामायण तक का विराट ञान-कोष, इन सब चीजों का एक साथ होना डा० कुमार विश्वास कहलाता है। देशभर मे तो उसका जादू सर चढकर बोलता ही है, मैंने विदेशों मे भी ऎसे श्रोता देखे है, जिन्हें उसके पूरे-पूरे गीत याद हैं। बाज़ार की भाषा मे कहें तो वो इस पीढ़ी का एक माञ ISO 2006 कवि है। |
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हास्य कवि सुरेन्द्र शर्मा |
डा० कुमार विश्वास, पश्चिमी उत्तर-प्रदेश के गाज़ियाबाद जिले में, बसंत पंचमी को पैदा हुए। प्राध्यापक पिता और कलावादी माँ का लयात्मक लोक-ञान व भयात्मक आत्मानुशासन, साथ-साथ मिले। इंजीनियरिंग से लेकर प्रादेशिक-सेवा तक और कामू से लेकर कामशास्त्र तक, थोक मे भटके, पर अटके सिर्फ साहित्य पर। विश्वविद्यालयीन प्राध्यापकी यानी बडी मास्टरी में हैं, पर उसमें भी ज़्यादा दिन रुकेंगे, इस पर खुद उन्हे भी शक है।
आप-बीती को गीत-बीती बनाने का उनका कौशल पूरे हिन्दी जगत मे आदर पाता है। हिन्दी कवि-सम्मेलनों मे हर प्रकार से (प्रशंसा से निंदा तक), अपनी पीढी के नंबर-१ कवि हैं। जिन्होनें उनका काव्य-पाठ सुना है, वो जानते है कि उनका जादू सर चढकर बोलता है। आई-आई-टी से लेकर आई-टी-आई तक और कुलपतीयों से लेकर कुलियों तक, उनके चाहने वालो की फेहरिश्त भारत की लोकतांञिक सम्स्याओं जैसी विविध व अंतहीन है।
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अतुल कनक |
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